अध्याय 2 · पाठ 135 मिनट

ट्रेड एग्रीमेंट और सर्टिफ़िकेट ऑफ़ ओरिजिन

ट्रेड एग्रीमेंट से क्या मिलता है, रूल्स ऑफ़ ओरिजिन कैसे काम करते हैं, कौन सा सर्टिफ़िकेट चाहिए और कौन देता है, और आयातक कम रेट कैसे क्लेम करता है।

रिबन मुहर वाला सर्टिफ़िकेट और दो पोर्ट के बीच आते-जाते पार्सल।

ट्रेड एग्रीमेंट से आपको क्या मिलता है

ट्रेड एग्रीमेंट पार्टनर देश में बने माल पर ड्यूटी घटाता या हटाता है। भारत बड़े एग्रीमेंट को फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) कहता है (कुछ के नाम CEPA, CECA या ECTA हैं) और छोटे वालों को प्रेफ़रेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट। इस कम ड्यूटी को प्रेफ़रेंशियल रेट कहते हैं; इसके बिना माल पर सामान्य MFN रेट लगता है।

यह दोनों तरफ़ काम करता है। निर्यातक के रूप में, आपका खरीदार अपने देश में कम ड्यूटी भर सकता है। आयातक के रूप में, आप पार्टनर देश से आए माल पर भारत में कम ड्यूटी भर सकते हैं।

हर बार दो शर्तें लागू होती हैं। प्रोडक्ट का कोड एग्रीमेंट के शेड्यूल में होना चाहिए, और माल सच में पार्टनर देश का होना चाहिए। इसका सबूत सर्टिफ़िकेट ऑफ़ ओरिजिन होता है, या कुछ एग्रीमेंट में निर्यातक की अपनी घोषणा।

रूल्स ऑफ़ ओरिजिन आसान शब्दों में

रूल्स ऑफ़ ओरिजिन तय करते हैं कि माल किस देश का बना माना जाएगा। DGFT की हैंडबुक ऑफ़ प्रोसीजर्स आम तौर पर ये कसौटियाँ बताती है:

  • पूरी तरह वहीं का (wholly obtained): वहीं उगाया, खोदा, पकड़ा या पैदा हुआ।
  • टैरिफ़ क्लासिफ़िकेशन में बदलाव: आयात किए इनपुट पर इतना काम होता है कि प्रोडक्ट इनपुट से अलग HS हेडिंग में चला जाता है।
  • वैल्यू एडिशन: कीमत का काफ़ी हिस्सा उसी देश में जुड़ता है, जैसा हिसाब एग्रीमेंट में बताया गया है।
  • मामूली काम से ज़्यादा: दोबारा पैक करना, लेबल लगाना, छाँटना या साधारण मिलाना जैसे सादे काम आम तौर पर माल को उस देश का नहीं बनाते।

हर एग्रीमेंट के अपने नियम होते हैं, अक्सर प्रोडक्ट के हिसाब से। एक ही प्रोडक्ट एक एग्रीमेंट में पास हो सकता है और दूसरे में फ़ेल।

उदाहरण: वैल्यू वाला नियम, काल्पनिक आँकड़ों के साथ
  • मान लीजिए एक एग्रीमेंट कहता है कि नॉन-ओरिजिनेटिंग (बाहर से आया) मटीरियल प्रोडक्ट की FOB कीमत का ज़्यादा से ज़्यादा 55% हो सकता है। यह नियम और आँकड़े सिर्फ़ समझाने के लिए हैं।
  • आपकी FOB कीमत ₹1,00,000 है और इसमें लगा आयातित कपड़ा ₹60,000 का है। यह 60% हुआ, तो प्रोडक्ट फ़ेल।
  • भारतीय कपड़ा लगाने पर आयातित मटीरियल ₹40,000 यानी 40% रह जाता है, और प्रोडक्ट पास।

प्रेफ़रेंशियल और नॉन-प्रेफ़रेंशियल सर्टिफ़िकेट

  • प्रेफ़रेंशियल सर्टिफ़िकेट किसी एक तय एग्रीमेंट के तहत कम रेट क्लेम करता है। हर एग्रीमेंट का अपना फ़ॉर्मेट है, और अपने नियम कि सर्टिफ़िकेट कब जारी हो और कब तक वैलिड रहे।
  • नॉन-प्रेफ़रेंशियल सर्टिफ़िकेट बस यह दिखाता है कि माल भारतीय है। खरीदार, बैंक या खरीदार के देश का कस्टम्स इसे माँग सकता है, पर इससे ड्यूटी कम नहीं होती।

DGFT के नियम कहते हैं कि अधिकृत एजेंसियाँ आवेदन लेंगी और सर्टिफ़िकेट जारी करेंगी सिर्फ़ उसके Trade Connect प्लेटफ़ॉर्म trade.gov.in पर। प्रेफ़रेंशियल सर्टिफ़िकेट हैंडबुक के Appendix 2B में लिखी एजेंसियाँ देती हैं, जैसे एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन काउंसिल, हर एजेंसी अपने एग्रीमेंट और प्रोडक्ट के लिए। नॉन-प्रेफ़रेंशियल सर्टिफ़िकेट Appendix 2E की एजेंसियाँ देती हैं, और प्रेफ़रेंशियल वाली एजेंसियाँ भी दे सकती हैं।

EFTA देशों और UK के साथ भारत के एग्रीमेंट में निर्यातक एजेंसी के पास जाने के बजाय ख़ुद भी ओरिजिन घोषित कर सकता है।

निर्यातक के रूप में सर्टिफ़िकेट कैसे लें

  1. देखें कि खरीदार का देश इस एग्रीमेंट में आपके HS कोड पर कम रेट देता है या नहीं, और कितना कम।
  2. देखें कि आपका प्रोडक्ट उस एग्रीमेंट का रूल ऑफ़ ओरिजिन पूरा करता है। एक कॉस्ट शीट रखें जिसमें हर इनपुट का HS कोड, कीमत और वह कहाँ का है, लिखा हो।
  3. trade.gov.in पर किसी अधिकृत एजेंसी को आवेदन करें, उसी इनवॉइस नंबर के साथ जो आपके शिपिंग बिल पर है।
  4. खरीदार को इलेक्ट्रॉनिक सर्टिफ़िकेट भेजें। कोई गलती हो तो उसमें ख़ुद बदलाव न करें: एजेंसी से बदले में नया (in-lieu) सर्टिफ़िकेट माँगें।
  5. अपने रिकॉर्ड संभालकर रखें। माल पहुँचने के काफ़ी समय बाद भी खरीदार के देश का कस्टम्स भारत से सर्टिफ़िकेट की जाँच करवा सकता है।

आयातक के रूप में कम रेट कैसे क्लेम करें

जब आप किसी एग्रीमेंट के तहत आयात करते हैं, तो कस्टम्स एक्ट की धारा 28DA और CAROTAR 2020, यानी Customs (Administration of Rules of Origin under Trade Agreements) Rules, बताते हैं कि आपको क्या करना है।

  1. फ़ाइल करने से पहले प्रूफ़ ऑफ़ ओरिजिन जाँच लें। अगर वह अधूरा है और एग्रीमेंट के फ़ॉर्मेट में नहीं है, उसमें ऐसा बदलाव है जिसे जारी करने वाली अथॉरिटी ने प्रमाणित नहीं किया, उसकी वैलिडिटी ख़त्म हो चुकी है, या वह ऐसे माल का है जो एग्रीमेंट में नहीं आता, तो कस्टम्स बिना किसी जाँच के कम रेट ठुकरा सकता है।
  2. बिल ऑफ एंट्री में घोषित करें कि माल शर्तें पूरी करता है, हर आइटम के लिए टैरिफ़ नोटिफ़िकेशन लिखें, और प्रूफ़ का रेफ़रेंस नंबर, तारीख़ और ओरिजिन क्राइटेरिया दर्ज करें।
  3. CAROTAR के Form I में माँगी गई जानकारी अपने पास रखें: माल रूल ऑफ़ ओरिजिन कैसे पूरा करता है। इसे बिल ऑफ एंट्री के साथ फ़ाइल नहीं करना होता, पर कस्टम्स माँगे तो दस वर्किंग डे में देनी होती है।
  4. सपोर्टिंग दस्तावेज़ बिल ऑफ एंट्री की तारीख़ से कम से कम पाँच साल रखें।

ध्यान दें: निर्यात करने वाले देश का सर्टिफ़िकेट आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं करता। आपको उचित सावधानी रखनी है कि ओरिजिन की जानकारी सही हो, और कस्टम्स क्लियरेंस के दौरान या उसके बाद भी क्लेम पर सवाल उठा सकता है। कॉस्ट और ओरिजिन की जानकारी सप्लायर से ऑर्डर देने से पहले लें, कस्टम्स के पूछने के बाद नहीं।

संक्षेप में

  • ट्रेड एग्रीमेंट सिर्फ़ लिस्ट में शामिल कोड पर, और सिर्फ़ उस माल पर ड्यूटी घटाता है जो उसके रूल्स ऑफ़ ओरिजिन पूरे करे।
  • प्रेफ़रेंशियल सर्टिफ़िकेट कम रेट क्लेम करता है; नॉन-प्रेफ़रेंशियल सिर्फ़ भारतीय ओरिजिन साबित करता है।
  • अधिकृत एजेंसियाँ सर्टिफ़िकेट ऑफ़ ओरिजिन सिर्फ़ trade.gov.in पर जारी करती हैं; EFTA देशों और UK के लिए निर्यातक ख़ुद भी घोषणा कर सकते हैं।
  • आयातक बिल ऑफ एंट्री में कम रेट क्लेम करते हैं, Form I की जानकारी पास रखते हैं और रिकॉर्ड पाँच साल रखते हैं।

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1.नॉन-प्रेफ़रेंशियल सर्टिफ़िकेट ऑफ़ ओरिजिन क्या करता है?

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2.आपके प्रोडक्ट में आयातित इनपुट लगे हैं। वैल्यू वाले नियम में वह कब भी भारतीय माना जा सकता है?

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3.प्रेफ़रेंशियल रेट क्लेम करने वाले आयातक के रूप में, CAROTAR के Form I में माँगी गई जानकारी का आप क्या करते हैं?

इस पाठ के शब्द

स्रोत

इन स्रोतों से तथ्य जाँचे गए:

ट्रेड अकादमी सिर्फ़ सीखने के लिए है, कानूनी, टैक्स या कस्टम्स सलाह नहीं। नियम और रेट नोटिफ़िकेशन से बदलते रहते हैं: कोई कदम उठाने से पहले लाइव स्रोत देखें या किसी लाइसेंसधारी कस्टम ब्रोकर से पूछें।