
Incoterm क्या करता है
Incoterm आपके सेल कॉन्ट्रैक्ट में लिखी तीन अक्षरों की शर्त है, जैसे FOB मुंबई या CIF हैम्बर्ग। इसके नियम इंटरनेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स (ICC) छापता है। मौजूदा संस्करण Incoterms 2020 है, जो 1 जनवरी 2020 से लागू है।
हर नियम तीन सवालों का जवाब देता है: विक्रेता माल कहाँ डिलीवर करेगा, सफ़र के किस हिस्से का खर्च कौन देगा, और माल के नुकसान या टूट-फूट का जोखिम विक्रेता से खरीदार के पास कहाँ जाएगा। शर्त के बाद जगह का नाम हमेशा लिखें। सिर्फ़ FOB लिखने से पता नहीं चलता कि कौन सा पोर्ट।
11 नियम, दो ग्रुप में
सात नियम हर तरह के ट्रांसपोर्ट पर चलते हैं, जिसमें कंटेनर, हवाई और सड़क शामिल हैं:
- EXW (Ex Works): विक्रेता माल अपने ही परिसर पर खरीदार के लिए तैयार रखता है। बाकी सब, एक्सपोर्ट क्लियरेंस समेत, खरीदार करता है।
- FCA (Free Carrier): विक्रेता एक्सपोर्ट के लिए क्लियर किया हुआ माल खरीदार के चुने कैरियर को सौंपता है, अपने परिसर पर या किसी और तय जगह पर।
- CPT (Carriage Paid To) और CIP (Carriage and Insurance Paid To): विक्रेता तय मंज़िल तक का भाड़ा देता है, और CIP में बीमा भी। जोखिम विक्रेता के देश में ही, माल कैरियर को सौंपते समय, बदल जाता है।
- DAP (Delivered at Place): तय जगह तक, उतारने के लिए तैयार माल का खर्च और जोखिम विक्रेता का। माल उतारना, इम्पोर्ट क्लियरेंस और ड्यूटी खरीदार के ज़िम्मे।
- DPU (Delivered at Place Unloaded): DAP जैसा, पर माल उतारता भी विक्रेता है। इसने पुराने DAT की जगह ली है।
- DDP (Delivered Duty Paid): विक्रेता माल को इम्पोर्ट के लिए क्लियर कराकर, इम्पोर्ट ड्यूटी और टैक्स भरकर, तय जगह पर डिलीवर करता है।
चार नियम सिर्फ़ समुद्र और अंदरूनी जलमार्ग के लिए हैं:
- FAS (Free Alongside Ship): शिपमेंट वाले पोर्ट पर जहाज़ के बगल में डिलीवरी।
- FOB (Free On Board): शिपमेंट वाले पोर्ट पर जहाज़ पर लादकर डिलीवरी। जोखिम वहीं बदलता है।
- CFR (Cost and Freight): मंज़िल वाले पोर्ट तक का समुद्री भाड़ा विक्रेता देता है, पर जोखिम विक्रेता के देश में माल जहाज़ पर लदते ही बदल जाता है।
- CIF (Cost, Insurance and Freight): CFR, और साथ में वह बीमा जो विक्रेता खरीदार के लिए लेता है।
छह नियम जो बार-बार मिलेंगे
भारतीय कोटेशन में छह नियम बार-बार आते हैं। हर एक में एक पेच है:
- EXW: ICC के मुताबिक यह मुख्य रूप से देश के अंदर के व्यापार के लिए ठीक है। इसमें एक्सपोर्ट क्लियरेंस विदेशी खरीदार के ज़िम्मे रहता है, इसलिए लिखित में तय करें कि शिपिंग बिल कौन फ़ाइल करेगा, या इसकी जगह FCA कोट करें।
- FOB और CFR: उस माल के लिए बने हैं जो सीधे जहाज़ पर लदता है, जैसे बल्क कार्गो। कंटेनर के लिए ICC, FCA या CPT की सलाह देता है।
- CIF: विक्रेता को सिर्फ़ न्यूनतम स्तर का बीमा लेना होता है, Institute Cargo Clauses (C)। CIP में ज़्यादा कवर वाला Clauses (A) ज़रूरी है। CIF में ज़्यादा कवर चाहिए तो कॉन्ट्रैक्ट में लिखें।
- DAP: विक्रेता माल खरीदार की तय जगह तक पहुँचाता है, पर इम्पोर्ट क्लियरेंस और ड्यूटी खरीदार ही करता है।
- DDP: विक्रेता खरीदार के देश में इम्पोर्ट क्लियरेंस भी करता है और ड्यूटी व टैक्स भी भरता है। ICC चेताता है कि हो सकता है विक्रेता यह कर ही न पाए, इसलिए सोच-समझकर इस्तेमाल करें।
ध्यान दें: आम गलती: कंटेनर वाले माल के लिए FOB या CIF लगाना। कंटेनर लदने से पहले ही किसी डिपो या टर्मिनल पर शिपिंग लाइन को सौंप दिया जाता है, फिर भी FOB और CIF में जोखिम तब तक विक्रेता का रहता है जब तक माल जहाज़ पर न लद जाए। FCA, CPT और CIP कंटेनर के असली तरीके से मेल खाते हैं।
Incoterm से कस्टम्स वैल्यू कैसे बदलती है
आयात पर भारतीय कस्टम्स ड्यूटी असेसेबल वैल्यू पर लेता है। कस्टम्स एक्ट, 1962 की धारा 14 के मुताबिक यह इम्पोर्ट की जगह पर डिलीवरी की कीमत है, जिसमें उस जगह तक का ट्रांसपोर्ट और बीमा शामिल है। इसलिए आपका Incoterm तय करता है कि कस्टम्स इनवॉइस की कीमत में क्या जोड़ेगा:
- EXW, FCA या FOB पर खरीदा: कस्टम्स भारतीय पोर्ट तक का भाड़ा और बीमा जोड़ता है।
- CFR पर खरीदा: कस्टम्स बीमा जोड़ता है।
- CIF पर खरीदा: कीमत में दोनों पहले से शामिल हैं।
- DAP या DDP पर अपने दरवाज़े तक खरीदा: कीमत में भारत पहुँचने के बाद के खर्च भी हैं, इसलिए अपने कस्टम ब्रोकर से पूछें कि बिल ऑफ एंट्री में उन्हें कैसे दिखाएँ।
- चीन का सप्लायर USD 10,000 FOB शंघाई कोट करता है। न्हावा शेवा तक समुद्री भाड़ा USD 800 और बीमा USD 50 है।
- CIF वैल्यू: 10,000 + 800 + 50 = USD 10,850।
- ₹85 प्रति डॉलर के उदाहरण वाले कस्टम्स रेट पर असेसेबल वैल्यू 10,850 × 85 = ₹9,22,250 बनती है, न कि सिर्फ़ FOB कीमत वाले ₹8,50,000।
- यहाँ भाड़ा, बीमा और रेट सिर्फ़ उदाहरण के लिए हैं। कस्टम्स वही कस्टम्स एक्सचेंज रेट लगाता है जो बिल ऑफ एंट्री फ़ाइल होने के दिन लागू हो।
निर्यात में कस्टम्स माल की वैल्यू एक्सपोर्ट की जगह पर डिलीवरी के हिसाब से लगाता है। इसलिए CIF बिक्री में भाड़ा और बीमा घटाकर शिपिंग बिल की FOB वैल्यू निकलती है।
शर्त कैसे चुनें
- तय करें कि सफ़र का कितना हिस्सा आप संभाल सकते हैं: सिर्फ़ अपने गेट तक, अपने देश के पोर्ट या डिपो तक, या खरीदार तक पूरा।
- शर्त को ट्रांसपोर्ट से मिलाएँ: कंटेनर और हवाई के लिए FCA, CPT या CIP; सीधे जहाज़ पर लदने वाले माल के लिए FOB, CFR या CIF।
- शर्त के बाद सही जगह और संस्करण लिखें, जैसे CIF Jebel Ali, Incoterms 2020।
- जाँच लें कि बीमा, भाड़े की बुकिंग और बैंक के माँगे दस्तावेज़ सब उसी शर्त से मेल खाते हैं।
संक्षेप में
- Incoterms 2020, ICC का मौजूदा संस्करण है: 11 नियम, सात हर ट्रांसपोर्ट के लिए और चार सिर्फ़ समुद्र के लिए।
- हर नियम तय करता है कि विक्रेता कहाँ डिलीवर करेगा, कौन सा खर्च कौन देगा, और जोखिम कहाँ बदलेगा।
- कंटेनर के लिए FOB, CFR और CIF से बेहतर FCA, CPT और CIP हैं।
- भारत में आयात ड्यूटी भारत तक पहुँचे माल की वैल्यू पर लगती है, इसलिए आपकी कीमत में जो भाड़ा और बीमा नहीं है, उसे कस्टम्स जोड़ देता है।
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इस पाठ के शब्द
स्रोत
- ICC: Incoterms rules
- ICC: Incoterms 2020
- ICC: Incoterms 2020 checklist and flowcharts
- CBIC: Customs Act, 1962 (section 14, valuation of goods)
इन स्रोतों से तथ्य जाँचे गए:
ट्रेड अकादमी सिर्फ़ सीखने के लिए है, कानूनी, टैक्स या कस्टम्स सलाह नहीं। नियम और रेट नोटिफ़िकेशन से बदलते रहते हैं: कोई कदम उठाने से पहले लाइव स्रोत देखें या किसी लाइसेंसधारी कस्टम ब्रोकर से पूछें।