अध्याय 3 · पाठ 205 मिनट

पेमेंट कैसे मिलता है: एडवांस, LC, DA और DP

निर्यातक को पेमेंट मिलने के मुख्य तरीके, हर एक में आपका और खरीदार का जोखिम, बैंक से दस्तावेज़ कैसे जाते हैं, और खरीदार को कैसे जाँचें।

निर्यातक और खरीदार के बीच बैंक: एक ओर कागज़, दूसरी ओर पैसा।

पेमेंट के चार तरीके

पेमेंट का तरीका तय करता है कि जोखिम किसके सिर है। एक सिरे पर खरीदार शिपमेंट से पहले पैसा देता है; दूसरे सिरे पर आप माल भेजकर इंतज़ार करते हैं। बीच में बैंक वे दस्तावेज़ अपने पास रखते हैं जिनसे माल पर कंट्रोल होता है, जब तक खरीदार पेमेंट न करे या पेमेंट का वादा न करे।

  • एडवांस पेमेंट: खरीदार शिपमेंट से पहले पूरा या कुछ हिस्सा पैसा देता है।
  • लेटर ऑफ क्रेडिट (LC): खरीदार का बैंक वादा करता है कि क्रेडिट की शर्तों से मेल खाते दस्तावेज़ जमा करने पर वह आपको पेमेंट करेगा।
  • डॉक्यूमेंट्स अगेंस्ट पेमेंट (DP): आप माल भेजते हैं, आपका बैंक दस्तावेज़ खरीदार के बैंक को भेजता है, और वह उन्हें खरीदार को तभी देता है जब वह पेमेंट कर दे।
  • डॉक्यूमेंट्स अगेंस्ट एक्सेप्टेंस (DA): खरीदार का बैंक दस्तावेज़ तब दे देता है जब खरीदार बिल ऑफ एक्सचेंज स्वीकार कर ले, यानी आगे की तय तारीख़ पर पेमेंट का वादा।

ओपन अकाउंट, जिसमें आप माल भेजकर दस्तावेज़ सीधे खरीदार को भेज देते हैं, सबसे ज़्यादा जोखिम वाला है। इसे उन्हीं खरीदारों के लिए रखें जिन्होंने पहले समय पर पेमेंट किया हो।

जोखिम किसके सिर

  • एडवांस: आपके लिए लगभग कोई जोखिम नहीं। सारा जोखिम आयातक का है, जिसे भरोसा करना होता है कि आप माल भेजेंगे।
  • LC: अगर आपके दस्तावेज़ शर्तों के मुताबिक हैं और LC खोलने वाला बैंक मज़बूत है, तो आपके लिए कम जोखिम। आयातक माल देखने से पहले, दस्तावेज़ों के बदले पेमेंट करता है।
  • DP: खरीदार पेमेंट से मना करके आपका माल विदेशी पोर्ट पर छोड़ सकता है, पर बिना पेमेंट के माल नहीं ले सकता।
  • DA: चारों में आपके लिए सबसे ज़्यादा जोखिम। माल खरीदार के पास पहुँच चुका होता है और हो सकता है वह तय तारीख़ पर पेमेंट न करे।

ध्यान दें: DP और DA में निर्यातकों की आम गलती: बैंक के पैसा वसूलने से पहले माल छोड़ देना, जैसे ओरिजिनल बिल ऑफ लैडिंग सीधे खरीदार को भेज देना या टेलेक्स रिलीज़ के लिए हाँ कह देना। बैंक आपको तभी तक बचा सकता है जब तक माल पर कंट्रोल वाले दस्तावेज़ उसके पास हैं।

बैंक के ज़रिए दस्तावेज़

आज ज़्यादातर लेटर ऑफ क्रेडिट UCP 600 के तहत खुलते हैं, जो डॉक्यूमेंटरी क्रेडिट के लिए ICC के नियम हैं और 1 जुलाई 2007 से लागू हैं। DP और DA जैसे कलेक्शन के अपने ICC नियम हैं, URC 522। कलेक्शन में बैंक सिर्फ़ दस्तावेज़ और पैसा आगे बढ़ाते हैं; वे खरीदार के पेमेंट की गारंटी नहीं देते।

  1. आप माल भेजते हैं और ट्रांसपोर्ट दस्तावेज़, इनवॉइस, पैकिंग लिस्ट और खरीदार का माँगा कोई सर्टिफ़िकेट इकट्ठा करते हैं।
  2. आप इन्हें बैंक के रिक्वेस्ट लेटर के साथ अपने बैंक को देते हैं: LC या कलेक्शन की शर्तें, दस्तावेज़ पेमेंट के बदले छूटेंगे या एक्सेप्टेंस के बदले, और खरीदार का बैंक।
  3. आपका बैंक इन्हें खरीदार के बैंक को भेजता है, जो तय शर्तों पर इन्हें छोड़ता है।
  4. पैसा आपके बैंक के ज़रिए लौटता है, और बैंक इसे EDPMS में आपके शिपिंग बिल के सामने दर्ज करता है।

RBI के नियम जो आपकी शर्तों पर असर डालते हैं

  • एक्सपोर्ट का एडवांस और बाकी पेमेंट एक ही बैंक से लें। बैंक बदलना हो तो दोनों बैंकों को बताएँ।
  • शिपमेंट के 9 महीने के अंदर पेमेंट लें, या 12 महीने में अगर एक्सपोर्ट का इनवॉइस या सेटलमेंट रुपये में है। देरी की वजह बताने पर आपका बैंक यह समय बढ़ा सकता है।
  • अगर कोई एक्सपोर्ट अपनी ड्यू डेट के एक साल बाद भी अनपेड है, तो आगे का एक्सपोर्ट सिर्फ़ पूरे एडवांस या इर्रिवोकेबल लेटर ऑफ क्रेडिट के बदले कर सकते हैं।
  • आयात की तरफ़, एडवांस की इजाज़त आपका बैंक तय करता है, और अपनी तय रकम से ऊपर स्टैंडबाय लेटर ऑफ क्रेडिट या गारंटी माँग सकता है।
उदाहरण: एडवांस, और बाकी DP पर
  • ऑर्डर की कीमत: USD 20,000। शर्तें: 30% एडवांस, 70% DP।
  • शिपमेंट से पहले एडवांस: 20,000 × 30% = USD 6,000।
  • दस्तावेज़ों के बदले बाकी: 20,000 − 6,000 = USD 14,000।
  • अगर खरीदार दस्तावेज़ लेने से मना कर दे, तो भी माल आपके कंट्रोल में है और USD 6,000 आपके पास हैं, जो माल वापस लाने या कहीं और बेचने में काम आएँगे।

शर्तें तय करने से पहले खरीदार को जाँचें

  • खरीदार, उसके बैंक और डील में शामिल हर किसी को सैंक्शन्स लिस्ट में जाँचें।
  • पक्का करें कि कंपनी असल में है: उसके अपने देश में रजिस्ट्रेशन, पता और वेबसाइट, और अगर हो तो उसका LEI।
  • उसका इम्पोर्ट रिकॉर्ड देखें। जहाँ देश कस्टम्स रिकॉर्ड छापते हैं, वहाँ उनसे पता चलता है कि वह सच में आपके जैसा माल खरीदता है या नहीं।
  • शुरुआत एडवांस या LC से करें, और कुछ ऑर्डर का समय पर पेमेंट मिलने के बाद ही DP या DA पर जाएँ।
  • एक्सपोर्ट क्रेडिट इंश्योरेंस के बारे में पूछें। भारत सरकार की कंपनी ECGC, पेमेंट न करने वाले खरीदारों के खिलाफ़ निर्यातकों का बीमा करती है।

संक्षेप में

  • निर्यातक के लिए एडवांस सबसे सुरक्षित है और DA सबसे जोखिम भरा; LC और DP बीच में हैं।
  • LC में बैंक सिर्फ़ उन्हीं दस्तावेज़ों पर पेमेंट करता है जो क्रेडिट की शर्तों से मेल खाते हों।
  • DP या DA कलेक्शन में बैंक दस्तावेज़ और पैसा आगे बढ़ाते हैं; पेमेंट की गारंटी नहीं देते।
  • RBI चाहता है कि एक्सपोर्ट का पैसा शिपमेंट के 9 महीने में आए, या रुपये में इनवॉइस या सेटलमेंट हो तो 12 में। उसके एक साल बाद भी न आए तो आगे के एक्सपोर्ट के लिए पूरा एडवांस या इर्रिवोकेबल LC चाहिए।

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ख़ुद को जाँचें

ख़ुद को जाँचें 1

1.डॉक्यूमेंट्स अगेंस्ट एक्सेप्टेंस (DA) में खरीदार को दस्तावेज़ कब मिलते हैं?

ख़ुद को जाँचें 2

2.इनमें से किसमें आपका, यानी निर्यातक का, जोखिम सबसे ज़्यादा है?

ख़ुद को जाँचें 3

3.आपको LC से पेमेंट मिलना है। बिल ऑफ लैडिंग में टाइपिंग की एक गलती से आपका पैसा क्यों अटक सकता है?

इस पाठ के शब्द

स्रोत

इन स्रोतों से तथ्य जाँचे गए:

ट्रेड अकादमी सिर्फ़ सीखने के लिए है, कानूनी, टैक्स या कस्टम्स सलाह नहीं। नियम और रेट नोटिफ़िकेशन से बदलते रहते हैं: कोई कदम उठाने से पहले लाइव स्रोत देखें या किसी लाइसेंसधारी कस्टम ब्रोकर से पूछें।