
चार दस्तावेज़, एक शिपमेंट
हर शिपमेंट के साथ कुछ कागज़ चलते हैं, जिन्हें कस्टम्स, बैंक, खरीदार और कैरियर सब पढ़ते और आपस में मिलाते हैं। ICEGATE के मुताबिक आयात या निर्यात के लिए बिल ऑफ लैडिंग या एयर वे बिल, कमर्शियल इनवॉइस और पैकिंग लिस्ट ज़रूरी सपोर्टिंग दस्तावेज़ हैं। इनवॉइस और पैकिंग लिस्ट एक साथ, यानी इनवॉइस-कम-पैकिंग लिस्ट, भी मान्य है।
- कमर्शियल इनवॉइस: विक्रेता और खरीदार, माल का विवरण, मात्रा, यूनिट कीमत, कुल कीमत, करेंसी और Incoterm। कस्टम्स इसी से माल की वैल्यू लगाता है, और बैंक इसी के बदले पेमेंट लेता है।
- पैकिंग लिस्ट: माल कैसे पैक है। कितने पैकेज, हर एक में क्या है, उन पर क्या मार्क है, और नेट व ग्रॉस वज़न।
- बिल ऑफ लैडिंग, समुद्र के लिए: शिपिंग लाइन या उसका एजेंट माल लेते समय देता है। यह माल की रसीद है, ढुलाई के कॉन्ट्रैक्ट का सबूत है, और नेगोशिएबल हो तो वह कागज़ है जिससे तय होता है कि माल कौन छुड़ा सकता है।
- एयर वे बिल, हवाई के लिए: एयरलाइन की रसीद और ढुलाई का कॉन्ट्रैक्ट। यह मालिकाना हक़ का कागज़ नहीं है: एयरलाइन माल उसी कंसाइनी को देती है जिसका नाम इस पर लिखा है।
इन सबसे पहले प्रोफ़ॉर्मा इनवॉइस आता है, यानी विक्रेता का कोटेशन। खरीदार इससे ऑर्डर देता है या लेटर ऑफ क्रेडिट खुलवाता है, पर कस्टम्स के पास कमर्शियल इनवॉइस ही जाता है।
इनका आपस में मेल क्यों ज़रूरी है
कस्टम्स एक्ट की धारा 46 कहती है कि बिल ऑफ एंट्री में बिल ऑफ लैडिंग का पूरा माल शामिल होना चाहिए। धारा 50 के तहत शिपिंग बिल और उसके पीछे के दस्तावेज़ों के सही होने की ज़िम्मेदारी निर्यातक की है। लेटर ऑफ क्रेडिट में बैंक तभी पेमेंट करता है जब दस्तावेज़ क्रेडिट की शर्तों से मेल खाएँ।
- 500 कार्टन, हर एक में 20 kg माल और 1.5 kg पैकिंग।
- नेट वज़न: 500 × 20 = 10,000 kg। ग्रॉस वज़न: 500 × 21.5 = 10,750 kg।
- इनवॉइस, पैकिंग लिस्ट और बिल ऑफ लैडिंग, तीनों में 500 कार्टन लिखे हों, और पैकिंग लिस्ट व बिल ऑफ लैडिंग दोनों में 10,750 kg ग्रॉस।
- बिल ऑफ लैडिंग में गलती से 10,570 kg टाइप हो गया तो यह मिसमैच है। बैंक इसी पर दस्तावेज़ लौटा सकता है, और कस्टम्स सवाल पूछ सकता है।
ध्यान दें: असल में सबसे ज़्यादा गलती माल के विवरण में होती है। इनवॉइस में कुछ लिखा है, पैकिंग लिस्ट में उसका छोटा रूप, और बिल ऑफ लैडिंग में कुछ तीसरा। हर दस्तावेज़ पर एक ही विवरण, मात्रा, मार्क और वज़न लिखें।
बिल ऑफ लैडिंग: माल किसके कंट्रोल में है
- नेगोशिएबल बिल, जो टू ऑर्डर बनता है, एंडोर्स करके आगे दिया जा सकता है। शिपिंग लाइन माल सिर्फ़ ओरिजिनल के बदले देती है, और इसी वजह से लेटर ऑफ क्रेडिट या कलेक्शन में बैंक माल को सिक्योरिटी के तौर पर रोक पाता है।
- स्ट्रेट बिल में एक ही कंसाइनी का नाम होता है और इसे एंडोर्स करके आगे नहीं दिया जा सकता।
- सी वे बिल कभी नेगोशिएबल नहीं होता। लाइन बिना किसी ओरिजिनल के, नाम लिखे कंसाइनी को माल दे देती है: काम जल्दी होता है, पर विक्रेता का माल पर कोई कंट्रोल नहीं रहता।
ओरिजिनल बिल एक सेट में बनते हैं। टेलेक्स रिलीज़ में, जिसे सरेंडर्ड बिल भी कहते हैं, शिपर लोडिंग पोर्ट पर ही ओरिजिनल वापस कर देता है और लाइन मंज़िल वाले ऑफ़िस को बिना ओरिजिनल के माल देने को कह देती है। यह तभी करें जब पेमेंट मिल चुका हो या खरीदार पर पूरा भरोसा हो, क्योंकि उसके बाद माल आपके कंट्रोल में नहीं रहता।
हाउस और मास्टर बिल
जब फ़्रेट फ़ॉरवर्डर या कंसॉलिडेटर आपका माल बुक करता है, तो दो बिल बनते हैं। शिपिंग लाइन फ़ॉरवर्डर को मास्टर बिल ऑफ लैडिंग देती है, और फ़ॉरवर्डर आपको हाउस बिल ऑफ लैडिंग देता है। हवाई में यही जोड़ी मास्टर और हाउस एयर वे बिल कहलाती है। आपका खरीदार मंज़िल पर फ़ॉरवर्डर के एजेंट से माल लेता है।
अगर पेमेंट लेटर ऑफ क्रेडिट से हो रहा है, तो शिपमेंट से पहले पक्का कर लें कि फ़ॉरवर्डर जो ट्रांसपोर्ट दस्तावेज़ देगा, उसे क्रेडिट मानता है।
दस्तावेज़ भेजने से पहले
- इनवॉइस और पैकिंग लिस्ट को ऑर्डर से मिलाएँ: विवरण, मात्रा, कीमत, Incoterm और करेंसी।
- बिल ऑफ लैडिंग या एयर वे बिल का ड्राफ़्ट जारी होने से पहले जाँचें: कंसाइनी, नोटिफ़ाई पार्टी, पोर्ट, मार्क, पैकेज और वज़न।
- पेमेंट कैसे और कब मिल रहा है, उसके हिसाब से रिलीज़ तय करें: ओरिजिनल बिल, टेलेक्स रिलीज़ या सी वे बिल।
- हर चीज़ की कॉपी शिपिंग बिल या बिल ऑफ एंट्री नंबर के साथ रखें, बैंक और कस्टम्स दोनों के लिए।
संक्षेप में
- इनवॉइस बताता है कि क्या और कितने में बिका, पैकिंग लिस्ट बताती है कि कैसे पैक है, और बिल ऑफ लैडिंग या एयर वे बिल कैरियर की रसीद और कॉन्ट्रैक्ट है।
- ICEGATE ट्रांसपोर्ट दस्तावेज़, इनवॉइस और पैकिंग लिस्ट को ज़रूरी सपोर्टिंग दस्तावेज़ मानता है।
- हर दस्तावेज़ पर एक ही विवरण, मात्रा और वज़न होना चाहिए।
- सिर्फ़ नेगोशिएबल बिल ऑफ लैडिंग पेमेंट मिलने तक माल को आपके कंट्रोल में रखता है; एयर वे बिल या सी वे बिल नहीं।
हमारे डेटा पर आज़माएँ
- एक्सपोर्ट पर बैंक क्या माँगता हैएक्सपोर्ट के दस्तावेज़ कलेक्शन या डिस्काउंटिंग के लिए भेजते समय ज़्यादातर बैंक जो जानकारी और दस्तावेज़ माँगते हैं।
- इम्पोर्ट की सर्विस का पेमेंट करने पर बैंक क्या माँगता हैविदेशी सप्लायर को सर्विस का पेमेंट करने से पहले क्या तैयार रखें: इनवॉइस, पर्पस कोड और सप्लायर के बैंक की जानकारी।
ख़ुद को जाँचें
इस पाठ के शब्द
स्रोत
- ICEGATE: FAQs (mandatory documents in e-SANCHIT)
- CBIC: Customs Act, 1962 (sections 46 and 50)
- ICC: Incoterms 2020 checklist (transport documents and letters of credit)
इन स्रोतों से तथ्य जाँचे गए:
ट्रेड अकादमी सिर्फ़ सीखने के लिए है, कानूनी, टैक्स या कस्टम्स सलाह नहीं। नियम और रेट नोटिफ़िकेशन से बदलते रहते हैं: कोई कदम उठाने से पहले लाइव स्रोत देखें या किसी लाइसेंसधारी कस्टम ब्रोकर से पूछें।